अकसर किये गए सवाल

मछली पालन क्यों करें, इसकी विशेषताएं क्या हैं ?

मत्स्य पालन सहायक व्यवसाय के रूप में ग्रामीण अंचलों में कम श्रम, कम लागत, कम समय में अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय है। बाजार की समस्या नहीं है । हर साईज की उत्पादित मछली का विक्रय आसानी से हो जाता है । इस कारण घाटे की संभावना अत्यन्त कम होती है । मत्स्य बीज उत्पादन से ३ माह में रु. ४५,००० की आय प्राप्त कर सकते हैं , जो की अन्य व्यवसाय के लाभ की तुलना में बहुत अधिक है ।

तालाब जलाशय के प्रबंधन के अधिकार किस संस्था को प्राप्त हैं ?

तालाब/जलाशय के प्रबंधन के अधिकार त्रि-स्तरीय पंचायतों, मछली पालन विभाग एवं मध्य प्रदेश मत्स्य महासंघ को निम्नानुसार प्राप्त हैं:-

  1. 10 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक के तालाब/जलाशय - ग्राम पंचायत ।
  2. 10 हैक्टेयर से अधिक 100 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक के तालाब/ जलाशय - जनपद पंचायत ।
  3. 100 हैक्टेयर से अधिक 1000 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक के तालाब/ जलाशय - जिला पंचायत ।
  4. 1000 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र से 2000 औसत जलक्षत्र तक के उपलब्ध एवं निर्माणाधीन जलाशय के पूर्ण होने पर शासन निर्णय अनुसार मछली पालन विभाग / मध्य प्रदेश मत्स्य महासंघ के अधीन रखा जावेगा ।
  5. 2000 हैक्टेयर से अधिक औसत जलक्षेत्र के जलाशय मत्स्य महासंघ के अधिनस्थ रहेंगे ।

त्रि-स्तरीय पंचायतों के तालाब/जलाशय प्रबंध के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए केवल मत्स्य पालन के आवंटन की प्रक्रिया/तकनीकी प्रक्रिया के अधिकार मत्स्य पालन विभाग के पास रहेंगे ।

तालाब/जलाशय आवंटन के प्राथमिकता क्रम क्या हैं ?

प्राथमिकता क्रम निम्नानुसार है:- वंशानुगत मछुआ जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अनुसूचित जाति/ पिछड़ावर्ग/ सामान्य वर्ग/ गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्ति/ स्व-सहायता समूह/ पंजीकृत सहकारी समितियां ।

क्या तालाब/जलाशय को मछली पालन के लिये नीलामी या ठेके पर प्राप्त किया जा सकता है ?

जी नहीं - प्रदेश के शासकीय /अर्धशासकीय संस्थाओं यथा नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर पालिका निगम, वन, ऊर्जा विभाग के सभी तालाब/जलाशय को नीलामी या ठेके पर देना प्रतिबंधित किया गया है । राज्य शासन द्वारा त्रि-स्तरीय पंचायतों को तालाब/जलाशय पट्टे पर देने के अधिकार दिये गये हैं परन्तु यदि कोई तालाब/जलाशय नगर पंचायत, नगर पालिका, नगर पालिका निगम, वन, ऊर्जा विभाग की किसी संस्था / निकाय के अधीन हों तो उनके पट्टे का आवंटन उन निकाय / विभाग के सक्षम अधिकारी द्वारा मछली पालन विभाग की मत्स्य पालन नीति के अनुसार 10 वर्ष की अवधि के लिये किया जावेगा ।

प्रदेश में मछुआ किसको कहते हैं तथा किसको प्राथमिकता प्राप्त है ?

मछुआ वह है जो अपनी आजीविका का अर्जन मछली पालन, मछली पकड़ने या मछली बीज उत्पादन आदि कार्य से करता हो ।
वंशानुगत मछुआ जाति/ धीवर - धीरम -ढीमर, भोई, कहार - कश्यम - सिंगराहा - सोंधिया - रायकवार - बाथम, मल्लाह, नावड़ा, केवट - मुड़हा - मुढ़ाहा - निषाद, कीर, मांझी को प्राथमिकता प्राप्त है

व्यक्ति विशेष / मछुआ स्व-सहायता समूह / मछुआ सहकारी समितियों को कितने जलक्षेत्र के तालाब/जलाशय दिये जाने का प्रावधान हैं ?

मछली पालन नीति के अनुसार - एक हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र के तालाब व्यक्ति विशेष हितग्राही को प्राथमिकता क्रम अनुसार आवंटित किये जाते हैं ।
1 हैक्टेयर से 5 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक के तालाब/जलाशय यदि इस क्षेत्र में पंजीकृत मछुआ सहाकारी समिति नहीं है तब स्व-सहायता समूह / मछुआ समूह को प्राथमिकता क्रम अनुसार आवंटित किये जाते हैं ।
5 हैक्टेयर से 1000 हैक्टेयर औसत जलक्षेत्र तक के तालाब/जलाशय पंजीकृत मछुआ सहकारी समितियों को प्राथमिकता क्रम अनुसार आवंटित किये जाते हैं यदि समितियां पंजीकृत न हों तो उक्त प्राथमिकता क्रम अनुसार स्व-सहायता समूह / मछुआ समूह को तालाबरु/जलाशय आवंटित किया जाता है, लेकिन स्व-सहायता समूह/ मछुआ समूह को आवश्यक होगा कि वे एक वर्ष में समिति पंजीकृत करावें ।

क्या प्रदेश में मछली नीति लागू है ?

जी हां - मध्य प्रदेश शासन, मछली पालन विभाग द्वारा दिनांक 08 अक्टूबर 2008 से मछली पालन की नीति का क्रियान्वयन किया गया है ।

मछली पालन में मछली या मछली बीज की हानि होती है तो क्या उसकी भरपाई शासन करेगा ?

प्राकृतिक आपदा से जिस वर्ष तालाब/जलाशय में मत्स्यबीज संचय न होने एवं मत्स्य बीज तथा मत्स्य की क्षति होती है तो उस वर्ष की पट्टा राशि हितग्राहियों को देय नहीं होगी ।
राजस्व पुस्तक परिपत्र की धारा -6 (4) के प्रावधान अनुसार:-
नैसर्गिक आपदा यथा अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प आदि से मछली फार्म (फिशफार्म) क्षतिग्रस्त होने पर मरम्मत के लिए प्रभावित को रूपये 6000/- तक प्रति हैक्टेयर के मान से सहायता अनुदान दिया जावेगा । अनुदान की यह राशि उन मामलों में देय नहीं होगी जिनमें सरकार की किसी अन्य योजना के अन्तर्गत् सहायता / अनुदान दिया गया है ।
नैसर्गिक आपदा यथा सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प आदि से मछली पालने वालों को मछली बीज नष्ट हो जाने पर प्रभावित को रूपये 4000/- तक प्रति हैक्टेयर के मान से सहायता अनुदान दिया जावेगा । अनुदान की यह राशि उन मामलों में देय नहीं होगी जिनमें मछली पालन विभाग योजना के अन्तर्गत् एक बार दिये गये आदान-अनुदान (सबसिडी) के अतिरिक्त, सरकारी की किसी अन्य योजना के अन्तर्गत् सहायता / अनुदान दिया गया है ।

क्या तालाब में मछली पालन के साथ-साथ सिंघाड़ा लगाने के लिये अलग से पट्टा राशि देनी पडेगी ?

  1. जिन तालाब/जलाशय में मछली पालन के साथ पूर्व से सिंघाड़ा, कमल गट्टा आदि जलोपज का पट्टा दिया जाता है उनसे सिर्फ मछली पालन कार्य हेतु निर्धारित पट्टा राशि ली जावेगी, पृथक से सिंघाड़ा/कमल गट्टा हेतु पट्टा राशि देय नहीं होगी ।
  2. पंचायतों के ऐसे तालाब जिनमें पूर्व से सिंघाड़ा / कमल गट्टा आदि की फसल ली जाती रही है, को मछली पालन के साथ-साथ सिंघाड़ा / कमल गट्टा आदि की फसल के लिए उसी समिति / समूह / व्यक्ति को, जिसे मछली पालन का पट्टा दिया जा रहा है, उसे ही सिंघाड़ा / कमल गट्टा आदि के लिए पट्टा दिया जावेगा ।

क्या नदी में मछली पकड़ सकते हैं ?

जी हां - प्रदेश में मछुआरों के लिये नदियों में निः शुल्क मत्स्याखेट का प्रावधान किया गया है । नदीय समृद्धि योजना के तहत् नदियों में मत्स्य भण्डारण को सुनिश्चित करने के लिये मत्स्यबीज संचयन का कार्यक्रम विभाग द्वारा किया जा रहा है ।

तालाब/जलाशयों में कौन-कौन सी मछलियां पाली जाती हैं ?

प्रदेश में प्रमुखतः कतला, रोहू, मृगल, मछली का पालन किया जाता है क्योंकि यह मछलियां आपसी प्रतिस्पर्धा नहीं करती हैं तथा व्यापारिक दृष्टिकोण से तेजी से बढ़ती हैं । सघन मत्स्य पालन के तहत् उक्त मछलियों के साथ-साथ सिल्वर कार्प, ग्रास कार्प एवं कामन कार्प मछलियों का पालन किया जाता है ।

तालाब/जलाशय में कितनी संख्या में मछली के बच्चे डाले जाते हैं ?

ग्रामीण तालाबों में 10000 फ्राई प्रति हैक्टेयर प्रतिवर्ष संचित की जाती है जिसमें कतला 40 प्रतिशत, रोहू 30 प्रतिशत एवं मृगल 30 प्रतिशत का अनुपात होना चाहिये ।

सबसे अधिक कौन सी मछली बढ़ती है ?

सबसे अधिक बढ़ने वाली मछली कतला है जिसकी बढ़वार एक साल में लगभग 1 किलोग्राम होती है ।

स्पान, फ्राई एवं फिंगरलिंग क्या है ?

मछली बीज की लम्बाई के आधार पर मछली बीज का नामकरण है, 5 मिली मीटर लम्बाई के मत्स्य बीज को स्पान कहते हैं । 25 मिलीमीटर साइज के मछली बीज को फ्राई कहते हैं जो तालाब में संचित की जाती है । 25 मिलीमीटर से 150 मिलीमीटर तक के मत्स्यबीज को फिंगरलिंग (अंगुलिकाए) कहते हैं जो बड़े जलाशयों में संचित की जाती है ।

पट्टा धारक समिति/ समूह/ व्यक्ति विशेष को तालाब / जलाशय की पट्टा अवधि समाप्त होने पर पुनः तालाब/जलाशय पट्टे पर आवंटित किया जा सकता है ?

जी हां - यदि पट्टा धारक समिति/ समूह/ व्यक्ति विशेष नियमानुसार किसी प्रकार से डिफाल्टर नहीं है और पट्टा अवधि समाप्ति के पश्चात् उनको पात्रता आती है तो उन्हें पुनः: तालाब/जलाशय पट्टे पर आवंटित किया जा सकता है ।

क्या किसी व्यक्ति द्वारा स्वंय की भूमि पर तालाब निर्माण कराया जा सकता है ?

नीलक्रांति योजनान्तर्गत् किसी भी व्यक्ति द्वारा अपनी स्वंय की भूमि पर (तालाब बनाने योग्य भूमि) योजनान्तर्गत् बैंक ऋण अथवा स्वंय के व्यय पर 2 हैक्टेयर तक का तालाब निर्माण लागत राशि रूपये 7.00 लाख प्रति हैक्टेयर की दर से कर सकता है 50 प्रतिशत अनुदान प्रति हैक्टेयर तालाब निर्माण पर दिया जाता है ।

क्या पट्टे पर लिये गये ग्रामीण तालाबों के रखरखाव हेतु कोई सहायता उपलब्ध कराई जाती है ?

नीलक्रांति योजनान्तर्गत पट्टे पर आवंटित तालाबों की इनपुट्स लागत (मत्स्यबीज, आहार, उर्वरक, खाद, रोग प्रतिरोधक दवाईयों के लिये) केवल एक बार प्रति हैक्टेयर रूपये 150000/- की लागत पर 50 प्रतिशत अनुदान इनपुटस लागत पर दिया जाता है साथ ही तालाब मरम्मत एवं सुधार, पानी के आगम-निर्गम द्वारों पर जाली लगाने हेतु केवल एक बार प्रति हैक्टेयर रूपये 150000/- की लागत पर 50 प्रतिशत की दर से अनुदान दिया जाता है ।